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मेरे शब्दों और आवाज़ को मिली एक नई पहचान”आकाशवाणी के 90 वर्ष और मेरी साहित्यिक साधना”डॉ. सविता वर्मा ‘ग़ज़ल'”यह आकाशवाणी है..या हम आकाशवाणी के नजीबाबाद केंद्र से बोल रहे हैं

मेरे शब्दों और आवाज़ को मिली एक नई पहचान”आकाशवाणी के 90 वर्ष और मेरी साहित्यिक साधना”डॉ. सविता वर्मा ‘ग़ज़ल'”यह आकाशवाणी है…” या “हम आकाशवाणी के नजीबाबाद केंद्र से बोल रहे हैं…”। यह मात्र एक उद्घोषणा या आवाज़ नहीं है, बल्कि भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक इतिहास की वह धड़कन है, जिसने अनेक पीढ़ियों को समृद्ध किया है।”खुला आकाश है यह मन,करना है सफ़र धरती से अंबर तक का।आओ उड़ चलें उम्मीदों के पंख लिए,अब न झुकना है, न ही रुकना।”आज जब आकाशवाणी (ऑल इंडिया रेडियो) अपने गौरवमयी और ऐतिहासिक सफ़र के 90 वर्ष पूर्ण कर रहा है, तब इस विराट यात्रा में मेरे जीवन के भी दो अनमोल दशक एक आत्मीय लहर बनकर शामिल हैं। एक साहित्यकार के रूप में आकाशवाणी के साथ मेरा रिश्ता केवल एक जुड़ाव नहीं, बल्कि मेरी शब्द-साधना का जीवंत साक्षी है। पिछले 21-22 वर्षों से आकाशवाणी नजीबाबाद से मेरा निरंतर संबंध रहा है। यह वही केंद्र है, जिससे मेरे बचपन की अनगिनत स्मृतियाँ जुड़ी हैं। सच कहूँ तो आकाशवाणी मेरे बचपन का साथी ही नहीं, मेरा पहला प्यार भी रहा है। आकाशवाणी नजीबाबाद के साथ-साथ आकाशवाणी दिल्ली के लोकप्रिय कार्यक्रम “बाल मंडल” में मैंने नन्हे-मुन्ने बच्चों के साथ अपनी बाल कविताएँ साझा की हैं। वहीं आकाशवाणी रोहतक केंद्र पर भी मुझे काव्य-पाठ करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इन तीनों केंद्रों ने मेरी लेखनी को एक व्यापक आकाश प्रदान किया है। आकाशवाणी के स्टूडियो में लगे माइक्रोफ़ोन के सामने बैठकर मैंने साहित्य के अनेक रंगों को जिया है। एक कवयित्री के रूप में अपनी भावनाओं को छंदों और कविताओं में पिरोया है तथा एक कहानीकार के रूप में मानवीय रिश्तों और सामाजिक सरोकारों को शब्दों में अभिव्यक्त किया है। आकाशवाणी ने मेरी प्रत्येक साहित्यिक विधा को सम्मान दिया है। गंभीर विषयों पर साहित्यिक वार्ताओं के माध्यम से श्रोताओं से संवाद स्थापित करना हो या बाल साहित्य के जरिए बच्चों के निष्कलुष संसार का हिस्सा बनकर उन्हें कहानियाँ और कविताएँ सुनाना—चाहे साहित्यिक कार्यक्रम हों या महिला-जगत से जुड़े प्रसारण—ये सभी अनुभव मेरे जीवन के सबसे संतोषदायक क्षणों में शामिल हैं। इस लंबी साहित्यिक यात्रा में वे पल मेरे लिए विशेष रूप से गौरवपूर्ण और भावुक रहे, जब आकाशवाणी नजीबाबाद ने मेरी अपनी साहित्यिक यात्रा को श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुत किया। आकाशवाणी नजीबाबाद के प्रेरक कार्यक्रम “उड़ान: हौसलों की” तथा एफएम रैनबो के लोकप्रिय कार्यक्रम “परवाज़ है काम तेरा” में प्रसारित मेरे साक्षात्कारों ने मुझे देशभर के अनगिनत युवाओं और साहित्य-प्रेमियों से सीधे जोड़ा। माइक के उस पार से मिले स्नेह और सम्मान ने मेरे भीतर के रचनाकार को एक नई उड़ान और नई परवाज़ प्रदान की। इन बाईस वर्षों में मैंने समय को तेज़ी से बदलते देखा है। स्पूल और टेप रिकॉर्डर के दौर से लेकर आज के डिजिटल और पॉडकास्ट युग तक, रेडियो की तकनीक भले ही बदल गई हो, लेकिन आकाशवाणी का साहित्य के प्रति अटूट सम्मान और श्रोताओं का निष्कलुष प्रेम आज भी वैसा ही बना हुआ है। रेडियो एक ऐसा अद्भुत माध्यम है, जहाँ चेहरा दिखाई न देने पर भी श्रोताओं का स्नेह सदैव बना रहता है। सच कहूँ तो आकाशवाणी शब्दों और आवाज़ का वह आत्मीय संसार है, जहाँ श्रोता और रचनाकार के बीच एक अटूट संबंध स्थापित हो जाता है।आकाशवाणी नजीबाबाद, दिल्ली और रोहतक केंद्रों की इस साहित्यिक त्रिवेणी के माध्यम से समाज के हर वर्ग तक अपनी बात पहुँचाना मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि और अमूल्य पूँजी है। 90 वर्षों का यह सफ़र केवल एक प्रसारण संस्था की यात्रा नहीं, बल्कि भारतीय चेतना, संस्कृति और साहित्य की सतत प्रवाहमान यात्रा है। इस ऐतिहासिक पड़ाव पर इस गौरवशाली मंच का हिस्सा होने पर मुझे स्वयं पर गर्व है। मेरी हार्दिक कामना है कि आकाशवाणी की यह मधुर गूँज युगों-युगों तक इसी प्रकार बनी रहे, निरंतर आगे बढ़ती रहे और नई पीढ़ियों को प्रेरित करती रहे।डॉ. सविता वर्मा ‘ग़ज़ल'(लेखिका पिछले 21-22 वर्षों से आकाशवाणी नजीबाबाद, दिल्ली एवं रोहतक केंद्रों से निरंतर जुड़ी हुई हैं। वे एक स्थापित कवयित्री, कहानीकार, बाल साहित्यकार और वार्ताकार हैं। आकाशवाणी नजीबाबाद के “उड़ान: हौसलों की” तथा एफएम रैनबो के “परवाज़ है काम तेरा” जैसे प्रतिष्ठित कार्यक्रमों में उनके प्रेरक साक्षात्कार प्रसारित हो चुके हैं। दैनिक जागरण के साप्ताहिक परिशिष्ट “संगिनी”, दैनिक जनवाणी, अमर उजाला तथा अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में भी उनके साक्षात्कार और रचनाएँ प्रकाशित होती रही हैं।)

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