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मैं नारी हूं,हार मानना नहीं जानती,क्रांतिकारी शालू सैनीप्रत्येक मृतक को अपना नाम देकर करती हैं सम्मानजनक अंतिम बिदाई

मैं नारी हूं,हार मानना नहीं जानती,क्रांतिकारी शालू सैनीप्रत्येक मृतक को अपना नाम देकर करती हैं सम्मानजनक अंतिम बिदाई रुड़की।द्दहेडू चौकी से मिली जानकारी पर नाबालिक बच्ची की वारिस बन विधि-विधान से लावारिसों की वारिस क्रांतिकारी शालू सैनी द्वारा अंतिम संस्कार किया गया।वे अब तक छह हजार से अधिक शवों को सम्मानजनक अंतिम बिदाई दे उनका दाह संस्कार कर चुकी है।संघर्ष,साहस और सपनों की उड़ान बनीं क्रांतिकारी शालू सैनी का कहना है कि जहां एक ओर समाज में महिलाएं आज भी कई चुनौतियों से जूझ रही हैं,वहीं दूसरी ओर कुछ बेटियां अपने हौसले और जज्बे से नई मिसाल कायम कर रही हैं।ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी सामने आई है क्रांतिकारी शालू सैनी की,जिनके शब्द ही नहीं,बल्कि उनका जीवन संघर्ष और आत्मविश्वास की जीवंत मिसाल बन चुका है।”मैं नारी हूँ,सोच रखती हूँ कुछ नया कर दिखाने की” ये सिर्फ पंक्तियां नहीं,बल्कि शालू सैनी की जिंदगी का सार हैं।उनके भीतर कुछ कर गुजरने का जुनून है,जो हर मुश्किल को चुनौती देती हैं।वे कहती हैं कि उनके अंदर इतना हौसला है कि किसी भी परिणाम को अंजाम तक पहुंचा सकती हैं और नामुमकिन को भी मुमकिन बना सकती हैं।शालू सैनी की जिंदगी आसान नहीं रही।उन्होंने अपने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे,लेकिन कभी हार नहीं मानी।वे खुद स्वीकार करती हैं कि दर्द तो बहुत सहा,किन्तु उसे अपनों तक कभी पहुंचने नहीं दिया।यही उनकी असली ताकत है,खुद टूटकर भी दूसरों को संभालना।उनका संघर्ष सिर्फ हालातों से नहीं,बल्कि किस्मत से भी रहा।उन्होंने हर बार मुश्किलों को चुनौती दी और खुद को हारने नहीं दिया।उनका मानना है कि नारी कमजोर नहीं होती,बल्कि वह हर परिस्थिति में खुद को ढालने और आगे बढ़ने की क्षमता रखती है।आज शालू सैनी उन सभी महिलाओं और लड़कियों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं,जो अपने सपनों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रही हैं।उनका संदेश साफ है कि ‘अगर हौसला मजबूत हो,तो कोई भी सपना अधूरा नहीं रहता’ बहरहाल समाज में जहां एक ओर बेटियों को सीमाओं में बांधने की कोशिश होती है,वहीं शालू सैनी जैसी महिलाएं उन सीमाओं को तोड़कर नई राह बना रही हैं।उनका संघर्ष,उनकी सोच और उनका आत्मविश्वास यह साबित करता है कि नारी सिर्फ सहने के लिए नहीं,बल्कि बदलने और बदलने की ताकत रखने के लिए बनी है।शालू सैनी आज एक नाम नहीं,बल्कि एक सोच बन चुकी है,एक ऐसी सोच,जो हर नारी को यह एहसास कराती है कि वह कुछ भी कर सकती है,अगर वह ठान ले।

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