उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय का द्वादश दीक्षांत समारोह संपन्न; मेधावियों को मिले स्वर्ण पदक, कई महत्वपूर्ण ग्रंथों का हुआ विमोचन l
बहादराबाद
उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय का द्वादश दीक्षांत समारोह शनिवार, भाद्रपद पूर्णिमा (विक्रम संवत 2083) को विश्वविद्यालय परिसर में अत्यंत भव्य, पारम्परिक और गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलाधिपति एवं उत्तराखंड के माननीय राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (से.नि., PVSM, UYSM, AVSM, VSM) ने की। कुलाधिपति द्वारा दीक्षांत समारोह के विधिवत शुभारंभ की औपचारिक घोषणा और अनुमति प्रदान करने के उपरांत पूर्वाह्न 11:51 बजे भगवान श्री विश्वनाथ की वैदिक स्तुति के साथ कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। कुलपति प्रोफेसर रमाकांत पांडे ने स्वागत भाषण प्रस्तुत करते हुए ‘अतिथि देवो भव’ की सनातन वैदिक परंपरा के तहत मंचासीन समस्त विभूतियों का सत्कार किया तथा विश्वविद्यालय की वार्षिक प्रगति, शोध गतिविधियों और संस्कृत के प्रचार-प्रसार की रूपरेखा रखी। कुलपति महोदय ने माननीय राज्यपाल के सैन्य जीवन, विशिष्ट पदकों—PVSM, UYSM, AVSM, VSM—और राष्ट्र सेवा का परिचय कराते हुए कहा कि जीवन में यदि कोई कठिनाई बनकर सामने आएगा तो उसका मुकाबला पूरी दृढ़ता से किया जाएगा और यदि कोई कोमलता व सद्भाव से पेश आएगा तो उसके समक्ष समाज व संस्थाएं उतनी ही विनम्रता व सौम्यता से प्रस्तुत होंगी।
समारोह के मुख्य चरण में उत्कृष्ट अकादमिक प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को मंच से सम्मानित किया गया। विद्यावारिधि (Ph.D.), आचार्य (M.A.) तथा शास्त्री (B.A.) स्तर की परीक्षाओं में सर्वोच्च अंक प्राप्त करने वाले मेधावी छात्र-छात्राओं को माननीय राज्यपाल एवं मंचस्थ अतिथियों के कर-कमलों द्वारा स्वर्ण पदक एवं उपाधियां प्रदान की गईं। इस पावन अवसर पर बौद्धिक एवं शोध जगत को समृद्ध करने वाली कई महत्वपूर्ण पुस्तकों का लोकार्पण भी हुआ, जिसमें कुलपति प्रो. रमाकांत पांडे द्वारा रचित तीन मौलिक पुस्तकें, भारत रत्न डॉ. भीमराव आंबेडकर के जीवन दर्शन पर केंद्रित डॉ. श्वेता अवस्थी की पुस्तक तथा डॉ. श्वेता अवस्थी व डॉ. मीनाक्षी रावत के संयुक्त संपादन में प्रकाशित ग्रंथ शामिल रहा। पर्यावरण संरक्षण और सनातन संस्कारों का संदेश देते हुए कुलपति महोदय द्वारा अतिथियों को शॉल तथा तुलसी का पौधा भेंट किया गया, वहीं डॉ. अजय परमार द्वारा गुरु तेग बहादुर जी के पावन प्रकाश पर्व पर खींचे गए ऐतिहासिक छायाचित्र को स्मृति चिन्ह के रूप में गणमान्य अतिथियों को सप्रेम भेंट किया गया।
विशिष्ट अतिथि एवं प्रदेश के उच्च शिक्षा, विद्यालयी शिक्षा (प्राथमिक व माध्यमिक), सहकारिता तथा तकनीकी शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने अपने उद्बोधन में सरकार की ऐतिहासिक उपलब्धियों को साझा करते हुए कहा कि वर्ष 2017 से चलाए गए अभियानों और 25 हजार स्वयंसेवकों के समर्पण से उत्तराखंड को वर्ष 2025 तक पूर्ण साक्षर राज्य बनाया गया है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2017 में चिन्हित 24 हजार टीबी मरीजों के सापेक्ष प्रभावी नीतियों के चलते मात्र तीन वर्षों में प्रदेश टीबी मुक्त हुआ और अब सरकार का अगला दृढ़ संकल्प राज्य को ‘नशा मुक्त उत्तराखंड’ बनाना है। डॉ. रावत ने रेखांकित किया कि राज्य के विश्वविद्यालयों द्वारा प्रतिवर्ष समाज में उत्कृष्ट कार्य करने वाली विभूतियों को मानद उपाधियां दी जा रही हैं, जिसके अंतर्गत अब तक 103 विशिष्ट साधकों को सम्मानित किया जा चुका है।
समारोह में आधार भाषण प्रस्तुत करते हुए प्राग्ज्योतिषपुर विश्वविद्यालय, गुवाहाटी (असम) के कुलपति प्रो. राघवेंद्र प्रसाद तिवारी ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) के क्रियान्वयन पर बल देते हुए कहा कि विद्यालय से विश्वविद्यालय तक संस्कृत को अग्रणी भूमिका निभानी होगी। उन्होंने ऐतिहासिक तथ्यों का उल्लेख करते हुए बताया कि मुगलों के पूर्व विश्व जीडीपी में भारत का योगदान 35 प्रतिशत था, जो बाद में घटकर 22 और ब्रिटिश काल के बाद मात्र 2 से 3 प्रतिशत रह गया, जिसका मुख्य कारण हमारी स्वावलंबी व कौशल युक्त शिक्षा का क्षरण था। उन्होंने कहा कि अमृत काल में देश की 62 प्रतिशत युवा कार्यशील जनसंख्या को संस्कृत, व्यावहारिक कौशल, अनुवाद और रोजगार से जोड़ना समय की मांग है।
वहीं आशीर्वचन देते हुए श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के पूर्व कुलपति प्रो. रमेश कुमार पांडे ने ‘पार्वती-परमेश्वर’ की स्तुति से शुरुआत करते हुए संस्कृत को संपूर्ण ज्ञान परंपरा का सजीव संवाद बताया। उन्होंने कहा कि संस्कृत के नैतिक मूल्यों को डिजिटल संरक्षण, मशीन अनुवाद और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से जोड़ना अनिवार्य है, ताकि नई पीढ़ी के भीतर वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सुसंस्कृत समाज का निर्माण हो सके। उन्होंने उपाधि प्राप्त करने वाले छात्र-छात्राओं से निरंतर परिश्रम का आह्वान करते हुए ‘जयतु भारतम्, जयतु संस्कृतम्’ के उद्घोष के साथ अपनी बात पूर्ण की।
कार्यक्रम के इस भव्य अवसर पर उत्तराखंड शासन के संस्कृत शिक्षा सचिव श्री दीपक कुमार ने सभी आगंतुकों एवं मंचासीन विभूतियों का आत्मीय स्वागत व अभिवादन किया। मंच पर विशिष्ट विभूतियों के रूप में लोक संस्कृति की साधक पद्मश्री डॉ. माधुरी बड़थ्वाल, प्रो. अनुसूया प्रसाद सहित विश्वविद्यालय कार्यपरिषद के सम्मानित सदस्य, विभिन्न संकायों के अध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, वरिष्ठ प्राध्यापकगण, स्थानीय प्रशासन व शासन के उच्चाधिकारी, शोधार्थी एवं नवदीक्षित विद्यार्थी भारी संख्या में उपस्थित रहे। दीक्षांत उद्घोषणा के साथ ही उपाधि प्राप्त करने वाले सभी विद्यार्थियों को भारतीय ज्ञान परंपरा के संवर्धन, मानवीय संवेदनाओं की रक्षा और राष्ट्र निर्माण के प्रति आजीवन समर्पित रहने की दीक्षा व शपथ दिलाई गई तथा अंत में राष्ट्रगान एवं वैदिक शांति पाठ के साथ समारोह का गरिमामय समापन हुआ।




