उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय में सात दिवसीय पंचकर्म एवं वैकल्पिक चिकित्सा कार्यशाला का छठा दिन सम्पन्न l उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के योग विज्ञान विभाग में आयोजित सात दिवसीय “पंचकर्म एवं वैकल्पिक चिकित्सा कार्यशाला” का छठा दिन अत्यंत ज्ञानवर्धक एवं प्रयोगात्मक गतिविधियों से परिपूर्ण रहा। इस अवसर पर योग विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष, नाड़ी विशेषज्ञ प्रो० लक्ष्मीनारायण जोशी ने “साउंड हीलिंग, नाद एवं नाड़ी चिकित्सा” विषय पर विद्यार्थियों को विस्तृत सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान किया।कार्यक्रम का आरंभ पारंपरिक वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ हुआ, जिसके पश्चात प्रो० जोशी ने भारतीय चिकित्सा पद्धतियों की प्राचीनता एवं वैज्ञानिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि नाड़ी विज्ञान भारतीय चिकित्सा की एक अत्यंत प्रभावी विधा है, जिसका आधार शरीर में प्रवाहित होने वाली सूक्ष्म ऊर्जा, रक्त संचार एवं तंत्रिका तंत्र के संतुलन पर आधारित है।अपने व्याख्यान में उन्होंने स्पष्ट किया कि “नाड़ी” शब्द संस्कृत के ‘नाड्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है प्रवाह या बहना। योगशास्त्र के अनुसार मानव शरीर में 72,000 नाड़ियाँ होती हैं, जिनके माध्यम से प्राण ऊर्जा का संचार होता है। यदि इन नाड़ियों में किसी प्रकार का अवरोध उत्पन्न हो जाए, तो शरीर में विभिन्न रोग उत्पन्न होने लगते हैं। नाड़ी चिकित्सा का उद्देश्य इन अवरोधों को दूर कर शरीर की प्राकृतिक कार्यप्रणाली को पुनः सक्रिय करना है।प्रो० जोशी ने नाड़ी विज्ञान के तीन मूलभूत सिद्धांतों को विस्तार से समझाया। पहला सिद्धांत “रक्त आपूर्ति” का है, जिसके अनुसार शरीर के प्रत्येक अंग के सुचारु कार्य के लिए उचित रक्त संचार आवश्यक है। जब किसी अंग में रक्त प्रवाह बाधित होता है, तो उसकी कार्यक्षमता प्रभावित हो जाती है। आधुनिक चिकित्सा में जहां एंजियोप्लास्टी या बाईपास सर्जरी द्वारा रक्त प्रवाह को बहाल किया जाता है, वहीं नाड़ी चिकित्सा में विशेष तकनीकों के माध्यम से इस प्रवाह को प्राकृतिक रूप से सक्रिय किया जाता है।दूसरा सिद्धांत “नर्व सप्लाई” का है। उन्होंने बताया कि शरीर के सभी अंगों का नियंत्रण तंत्रिका तंत्र द्वारा होता है। यदि किसी अंग का मस्तिष्क से संपर्क बाधित हो जाता है, तो वह अंग सही ढंग से कार्य नहीं कर पाता। उदाहरण स्वरूप, ब्रेन स्ट्रोक के रोगियों में हाथ-पैरों की गतिशीलता प्रभावित हो जाती है। नाड़ी चिकित्सा इन तंत्रिका संबंधों को पुनः संतुलित करने में सहायक सिद्ध होती है।तीसरा एवं सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत “ऊर्जा या प्राण शक्ति” का है। भारतीय योग एवं आयुर्वेद के अनुसार प्राण ऊर्जा ही जीवन का आधार है। जब किसी नाड़ी में प्राण ऊर्जा का प्रवाह बाधित होता है, तो संबंधित अंग की कार्यक्षमता कमजोर हो जाती है। इस स्थिति में नाड़ी चिकित्सा के माध्यम से ऊर्जा के प्रवाह को संतुलित एवं सक्रिय किया जाता है, जिससे शरीर में स्वास्थ्य पुनः स्थापित होता है।कार्यशाला के दौरान प्रो० जोशी ने साउंड हीलिंग एवं नाद चिकित्सा पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि ध्वनि केवल सुनने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह एक शक्तिशाली उपचार विधि भी है। विशेष प्रकार की ध्वनि तरंगें शरीर की कोशिकाओं एवं ऊर्जा केंद्रों को प्रभावित कर संतुलन स्थापित करती हैं। साउंड हीलिंग एक ऐसी चिकित्सा पद्धति है, जिसमें ध्वनि तरंगों के माध्यम से शरीर एवं मन को संतुलित किया जाता है। नाद योग के अनुसार सम्पूर्ण ब्रह्मांड ध्वनि से उत्पन्न हुआ है, और यही ध्वनि (नाद) शरीर के भीतर भी ऊर्जा के रूप में विद्यमान रहती है।छात्रों को इस दौरान विभिन्न वाद्य यंत्रों, मंत्रों एवं ध्वनि कंपन के प्रयोगों के माध्यम से यह समझाया गया कि कैसे ध्वनि तरंगें मानसिक तनाव, चिंता एवं शारीरिक विकारों को कम करने में सहायक होती हैं। कार्यशाला में विद्यार्थियों ने सक्रिय रूप से भाग लेते हुए इन तकनीकों का अभ्यास भी किया।इस अवसर पर हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से डॉ अर्पित जोशी, योग प्रशिक्षक श्री राजेंद्र नौटियाल, शोधार्थी दिशांत शर्मा, गौरी, निक्की, शिवानी, पीयूष मिश्रा, संजय, उमा, स्वाति, इतिका, अंशिका, हरिवता, वैश्णवी, श्रीकांत, तनिष्क, दिया, मानसी, अभिनव, विभा, योगेश आदि उपस्थित रहे।




