नसीम अंसारी
हरिद्वार देश के प्राईवेट स्कूलों में एक सत्र वर्ष में केवल
पांच माह ही पढ़ाई होती है और सात माह का अवकाश रहता है, जबकि अभिभावकों के द्वारा फीस पूरे वर्ष की अदा की जाती है। इतने अधिक अवकाश होने के कारण अध्यापकों पर भी कम समय में सारा पाठ्यक्रम समाप्त करने का दबाव रहता है व अधिक अवकाश होने से अधिकांश बच्चों का ध्यान पढ़ाई से दूर होता है।
एक सत्र वर्ष में कुल अवकाश सात माह कैसे हो जाते हैं? रविवार के 52, शनिवार के 52, त्योहारों के 40, ग्रीष्मकालीन 35, शीतकालीन 10, खराब मौसम होने पर जिलाधिकारी के निर्देश पर लगभग 5, स्कूल में वार्षिकोत्सव व स्पोर्ट्स मीट आदि के 6 व हरिद्वार जैसे शहर में कांवड़ यात्रा के दौरान 10। इन सब अवकाश की संख्या को जोड़ा जाए तो कुल अवकाश का जोड़ 210 दिन बनेगा व 210 दिन को 30 से भाग दें तो सात माह प्राप्त होते हैं अर्थात् सात माह का अवकाश। जिसका अर्थ यह हुआ कि एक सत्र वर्ष में स्कूल कभी कभार ही खुलते हैं व अधिकांश समय तो बंद ही रहते हैं जिस कारण छात्रों में अनुशासनहीनता बढ़ती है व पढ़ाई से ध्यान हटता है।
देश में शिक्षा की इस स्थिति को शिक्षा मंत्रालय को गंभीरता से लेना चाहिए व इस दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिएं व स्कूलों में इतने अधिक अवकाश की संख्या को कम से कम करने का प्रयास करना चाहिए। प्राइवेट स्कूलों में शनिवार के अवकाश तो कम से कम समाप्त ही कर देना चाहिए क्योंकि वैसे ही भारत देश में त्योहारों के अवकाश ही अत्यधिक हो जाते हैं व शनिवार का अवकाश रखने का चलन पाश्चात्य देशों से आया है जहां न तो इतने त्योहार मनाए जाते हैं अतः न ही त्योहारों के इतने अवकाश घोषित किए जाते हैं।
जिस देश में “पढ़ेगा इंडिया तभी तो बढ़ेगा इंडिया” का नारा दिया जाता है उस देश में प्राइवेट स्कूलों में ऐसा होना उचित नहीं कहा जा सकता है व इससे यह भी सिद्ध होता है कि इन स्कूलों में भारी भरकम फीस अदा करने के बावजूद अभिभावकों का पैसा वसूल नहीं हो रहा है व उस पर भी आठ-दस हज़ार रुपए की वार्षिक बिल्डिंग फंड की फीस, स्कूल बस की फीस, प्राइवेट ट्यूशन या कोचिंग की फीस, महंगी कॉपी किताब स्टेश्नरी व स्कूल यूनिफार्म इत्यादि का खर्च जोड़ा जाए तो हरिद्वार जैसे शहर में ही एक सत्र वर्ष का सवा लाख से डेढ़ लाख रुपए अथवा प्रतियोगी परीक्षाओं की कोचिंग लेने की स्थिति में इससे भी अधिक खर्च हो जाता है।
अब यदि कोई यह कहे कि सस्ती पढ़ाई के लिए सरकारी स्कूल से बच्चे की पढ़ाई करवा लीजिए तो सर्वविदित है कि भारत देश में अधिकांश सरकारी स्कूलों की स्थिति वैसे ही कोई विशेष अच्छी नहीं होती है व अनेक सरकारी स्कूलों के भवन तक जर्जर स्थिति में होते हैं जहां उन मूलभूत सुविधाओं का भी अभाव होता है जोकि एक स्कूल में होनी चाहिएं व इस कारण आज के समय में अनेक निम्नवर्गीय लोग भी सरकारी स्कूल में अपने बच्चों का दाखिला करवाने से परहेज़ करते हैं व किसी सस्ते प्राइवेट स्कूल में दाखिला दिलवाते हैं।
हरिद्वार के भेल कंपाउंड में ही गत अनेक वर्षों में कुछ सरकारी स्कूल जैसे: – विद्या मंदिर इंटर कॉलेज सेक्टर-१, केंद्रीय विद्यालय नं०२ इत्यादि बंद हो चुके हैं व कुछ स्कूल बंद होने की कगार पर हैं क्योंकि लोग अपने बच्चों का एडमिशन उन स्कूलों में नहीं करवा रहे थे अथवा नहीं करवा रहे हैं।




