वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिंदी’ विषय पर संपन्न हुआ राष्ट्रीय व्याख्यान

आज दिनांक 14 सितंबर 2026 को भाषा एवं आधुनिक ज्ञान विज्ञान विभाग उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा आभासी माध्यम (ऑनलाइन) से आयोजित राष्ट्रीय व्याख्यानमाला के आमंत्रित विद्वान के रूप में कोचीन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कोच्चि के पूर्व कुलपति प्रोफेसर शशि धरन ने ‘वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिंदी’ में बोलते हुए कहा कि हिंदी आज भारतीय सीमाओं से आगे निकलकर विश्व में प्रमुख संवाद भाषा के रूप में स्थापित हो रही है। विश्व स्तर पर हिंदी की जड़ें मजबूत करने में प्रवासी भारतीयों के योगदान की सराहना करते हुए उन्होंने कहा, “हिंदी जब सीमा पार करती है, तो वह भारतीय संस्कृति की ब्रांड एम्बेस्डर बन जाती है और पूरे देश का प्रतिनिधित्व करती है।”

उन्होंने जोर देकर कहा कि हिंदी को केवल बोलना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसमें गुणवत्तापूर्ण साहित्य का सृजन भी अनिवार्य है। युवाओं का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि वे आगे आएँ और हिंदी में विश्वस्तरीय साहित्य सृजन का प्रयास करें । हिंदी को इस मुकाम तक पहुँचाने में साहित्यकारों की अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।
उन्होंने कहा भाषा केवल शब्द नहीं है
। भाषा वह है जिसमें मां की लोरियां हैं, धरती की पीड़ा है, बचपन की स्मृतियां हैं, जीवन के अनुभवों की खट्टी मीठी यादें समाहित हैं । भाषा में तुलसी के राम की वाणी, प्रेमचंद की वाणी, कबीर का फक्कड़पन, निराला के विद्रोह की अनुगूँज समाहित है । इसलिए हिंदी केवल भारत की भाषा नहीं है, अपितु वह समूची भारतीय संस्कृति एवं जीवन दर्शन है ।
हिंदी की वैश्विक यात्रा यूं ही नहीं प्रारंभ हुई, हिंदी भाषा की उन्नति में, भाषा की संस्कृत में, प्रवासी लोगों की पांचवीं पीढ़ी कार्य कर रही है । भाषा कभी मरती नहीं है, बल्कि यह उसके बोलने वालों पर निर्भर करती है । भाषा का बड़ा विश्वविद्यालय हमारा घर ही है । भाषा की वैश्विक यात्रा में 7 हजार से अधिक भाषण बोली जाती हैं, 30 से अधिक अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं का प्रकाशन तथा अनेक आकाशवाणी केंद्रों का प्रसारण इसकी वैश्विक यात्रा का जीवंत प्रमाण है ।
कार्यक्रम के अध्यक्ष उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर रमाकांत पांडे ने अपने वक्तव्य में कहा कि हिंदी निरंतर नए आयाम छू रही है और इसका भविष्य पूरी तरह उज्ज्वल है। उन्होंने कहा, “कोई भी भाषा कमजोर नहीं होती, बल्कि उसका प्रयोक्ता (उपयोग करने वाले) कमजोर होता है। सभी भारतीयों को हिंदी में बात करने पर गर्व का अनुभव करना चाहिए।”
प्रोफेसर पांडे ने यह भी स्पष्ट किया कि सभी भारतीय भाषाएँ एक-दूसरे की अनुपूरक हैं। उन्होंने युवाओं को अपनी मातृभाषा सीखने और उसके संरक्षण के लिए प्रेरित करते हुए कहा कि हमें तय समय सीमा के भीतर हिंदी के प्रयोक्ताओं को और अधिक दक्ष एवं जागरूक बनाना होगा।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए भाषा एवं आधुनिक ज्ञान विज्ञान संकाय के पूर्व अध्यक्ष, प्रोफेसर (डॉ.) दिनेश चंद्र चमोला ने कहा कि हिंदी प्रयोगधर्मा भाषा है। आज वह आनंदमूलक स्वरूप से उसने प्रयोजनमूलक स्वरूप की ओर प्रदार्पण करते हुए उसने हिंदी के पाठकों, छात्रों व शोधार्थियों के लिए ज्ञान और वृत्ति के अनेकानेक नवीन गवाक्ष खोले हैं । आज वैश्विक संदर्भ में उसने अपने बहु परियोजनी संदर्भों की खोज कर अपनी उपादेयता सिद्ध की है । उन्होंने कहा कि साधना से ही मूल्य, तप, साधना एवं प्रसिद्धि शाश्वत मार्ग तय किया जा सकता है । हमें प्रायः यह आत्म-विश्लेषण करना चाहिए जो कुछ भी मेंरे पास ज्ञान अथवा शोध-कार्य की संपदा है, उसमें मेरा अपना (ठोस) कितना है, यह विश्लेषण अवश्य भावी ज्ञान परंपरा का अवलंब सिद्ध हो सकता है ।
अंत में धन्यवाद ज्ञापन सहायक आचार्य डॉ.अनूप बहुखंडी ने किया ।
इस अवसर पर भगवान दास संस्कृत महाविद्यालय के पूर्व प्रधानाचार्य डॉ भोला झा, डॉ हरीश तिवारी, डॉ आरती सैनी, डॉ रुपेश शर्मा, स्वामी ऋषिकेश ब्रह्मचारी, श्रीलेखा, अनीता, दिव्यांशु, मीनाक्षी, सचिन, प्रियांशु, फातिमा, रश्मि आदि उपस्थित रहे।




