अंबेडकर जयंती पर ख़ास पैग़ाम
आज 14 अप्रैल अंबेडकर जयंती के मुबारक मौके पर हम उस शख़्सियत को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करते हैं, जिसने हमें एक ऐसा दस्तूर-ए-हयात (संविधान) दिया, जो हर शहरी को बराबरी, इंसाफ़ और इज़्ज़त का हक़ देता है।
मगर अफ़सोस कि आज का माहौल दस्तूर की रूह के ख़िलाफ़ जा रहा है। कुछ ताक़तें इस आइनी किताब को अपने मतलब के मुताबिक़ मोड़ने, बदलने और इसकी अहमियत को कम करने की साज़िशों में लगी हुई हैं। ऐसे हालात में हमारा फ़र्ज़ बनता है कि हम तफ़क्कुर (सोच) और शऊर (जागरूकता) के साथ आगे आएं और इन नापाक इरादों का मुकाबला करें।
दलित समाज और मुस्लिम समाज जो आज़ादी के बाद से अपने हुक़ूक़ और वजूद की लड़ाई लड़ रहे हैं, उन्हें एकजुट होकर इन तास्सुबात और जुल्म के खिलाफ़ आवाज़ उठानी होगी। ख़ास तौर पर जो हालात बोधगया, बिहार में देखने को मिल रहे हैं, वो काबिल-ए-गौर हैं। ये जद्दोजहद सिर्फ़ एक क़ौम या तबक़ा की नहीं, बल्कि पूरे हिन्दुस्तानी समाज की है।
हमें याद रखना चाहिए कि माशरा (समाज) रवादारी, मुहब्बत और बराबरी की बुनियाद पर चलता है। जब तक हम आपसी रिश्तों में इत्तेहाद (एकता) और इख़लास (सच्चाई) नहीं लाएंगे, तब तक समाज में न इंसाफ़ मुकम्मल होगा और न ही सुकून।
आज के दिन हम डॉ. भीमराव अंबेडकर साहब के फ़लसफ़े को अपनी ज़िन्दगी का हिस्सा बनाएं, और मिल-जुलकर दस्तूर-ए-हिंद की हिफ़ाज़त का अहद करें।
अंबेडकर जयंती की दिली मुबारकबाद और नज़्र-ए-अक़ीदत।




